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‖ द्वादशपञ्जरिका स्तोत्र ‖

मूढ जहीहि धनागमतृष्णां कुरु सद्बुद्धिम् मनसि वितृष्णाम् |
यल्लभसे निज कर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ‖ 1 ‖

रे मूढ ! अपने धन एकत्रित करने की तृष्णा का त्याग कर, अपने मन को वितृष्णा की सद्बुद्धि में लगा । जो कुछ भी अतीत में किये गए कर्मों से प्राप्त हुआ है उससे ही अपने चित्त को संतुष्ट रख ।

अर्थमनर्थं भावय नित्यं नास्ति ततः सुख लेशः सत्यम् |
पुत्रादपि धनभाजां भीतिः सर्वत्रैषा विहिता नीतिः ‖ 2 ‖

धन अकल्याणकारी है और इससे जरा सा भी सुख नहीं मिल सकता है, ऐसा विचार प्रतिदिन करना चाहिए | धनवान व्यक्ति तो अपने पुत्रों से भी डरते हैं सदा ऐसी ही नीतिविहित है ।

का ते कान्ता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः |
कस्य त्वं वा कुत आयातः तत्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ‖ 3 ‖

कौन तुम्हारी पत्नी है, कौन तुम्हारा पुत्र है, ये संसार अत्यंत विचित्र है, तुम किसके हो, कहाँ से आये हो? हे भाई ! इस बात पर तो पहले विचार कर लो ।

मा कुरु धनजन यौवन गर्वं हरति निमेषात्-कालः सर्वम् |
मायामयमिदम्-अखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा ‖ 4 ‖

धन, शक्ति और यौवन पर गर्व मत करो, समय एक पालक झपकते में इनको नष्ट कर देता है । इस विश्व को माया से घिरा हुआ जान कर तुम ब्रह्म पद में प्रवेश करो ।

कामं क्रोधं लोभं मोहं त्यक्त्वाऽऽत्मानं पश्यति सोऽहम् |
आत्मज्ञ्नान विहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरक निगूढाः ‖ 5 ‖

काम, क्रोध, लोभ, मोह को छोड़ कर, स्वयं में स्थित होकर विचार करो कि मैं कौन हूँ, जो आत्म- ज्ञान से रहित मोहित व्यक्ति हैं वो बार-बार छिपे हुए इस संसार रूपी नरक में पड़ते हैं

सुरमन्दिर तरु मूल निवासः शय्या भूतलम्-अजिनं वासः |
सर्व परिग्रह भोगत्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः ‖ 6 ‖

देव मंदिर या पेड़ के नीचे निवास, पृथ्वी जैसी शय्या, अकेले ही रहने वाले, सभी संग्रहों और सुखों का त्याग करने वाले वैराग्य से किसको आनंद की प्राप्ति नहीं होगी

शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ मा कुरु यत्नं विग्रह सन्धौ |
भव समचित्तः सर्वत्र त्वं वाञ्छस्यचिराद् विष्णुत्वम् ‖ 7 ‖

शत्रु, मित्र, पुत्र, बन्धु-बांधवों से संधि या लड़ाई के लिए प्रयत्न मत करो, यदि तुम शाश्वत विष्णु पद को प्राप्त करना चाहते हो तो सर्वत्र समान चित्त वाले हो जाओ ।

त्वयि मयि सर्वत्रैको विष्णुः व्यर्थं कुप्यसि मय्यसहिष्णुः |
सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्-सृज भेदाज्ञानम् ‖ 8 ‖

तुममें, मुझमें और अन्यत्र भी सर्वव्यापक विष्णु ही हैं, तुम व्यर्थ ही क्रोध करते हो, सहिष्णु बनो । सभी को अपने समान ही देखो और सभी से अभेद की स्थिति जानो ।

प्राणायामं प्रत्याहारं नित्यानित्य विवेक विचारम् |
जाप्यसमेत समाधि विधानं कुर्व वधानं महद्-अवधानम् ‖ 9 ‖

प्राणायाम, उचित आहार, नित्य इस संसार की अनित्यता का विवेक पूर्वक विचार करो, प्रेम से प्रभु-नाम का जाप करते हुए समाधि में ध्यान दो, बहुत ध्यान दो

नलिनी दलगत जलमति तरलं तद्वज्जीवित मतिशय चपलम् |
विद्धि व्याध्यभिमान ग्रस्तं लोकं शोकहतं च समस्तम् ‖ 10 ‖

जीवन, कमल-पत्र पर पड़ी हुई पानी की बूंदों के समान अनिश्चित एवं बहुत ही चंचल (क्षणभंगुर) है। यह समझ लो कि समस्त विश्व रोग, अहंकार और दु:ख में डूबा हुआ है

का तेष्टादशदेशे चिन्तावातुल तव किं नास्ति नियन्ता |
यस्त्वां हस्ते सुदृढनिबद्धं बोधयति प्रभवादिविरुद्धम् ‖ 11 ‖

कौन सी अठारह चिंताएं तुम्हें हैं, क्यों तुम्हारा मन वायु की तरह काँपता है, इसका कोई नियंत्रक नहीं है । कौन है जो हाथों से पकड़ कर तुम्हें इस जन्म-मरण से मुक्ति का ज्ञान दे सके ?

गुरु चरणाम्भुज निर्भरभक्तः संसाराद्-अचिराद्-भव मुक्तः |
सेन्दिय मानस नियमादेवं द्रक्ष्यसि निज हृदयस्थं देवम् ‖ 12 ‖

गुरु के चरण कमलों का ही आश्रय मानने वाले भक्त बनकर सदैव के लिए इस संसार में आवागमन से मुक्त हो जाओ, इस प्रकार मन एवं इन्द्रियों का निग्रह कर अपने हृदय में विराजमान प्रभु के दर्शन करो

द्वादशपञ्जरिकामय एषः शिष्याणां कथितो ह्युपदेशः |
येषां चित्ते नैव विवेकस्ते पच्यन्ते नरकमनेकं ‖ 13 ‖

इस द्वादश पंजरिका शिष्यों के लिए उपदेश है, जिनके चित्त में विवेक ही नहीं है, वे अनेक नरकों में पड़ते हैं

‖ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं द्वादशपञ्जरिकास्तोत्रम् संपूर्णम् ‖


Roman Transliteration & English Meaning

mūḍha jahīhi dhanāgamatr̥ṣṇāṁ kuru sadbuddhim manasi vitr̥ṣṇām |
yallabhase nija karmopāttaṁ vittaṁ tena vinodaya cittam ‖ 1 ‖

Oh fool ! Give up your thirst to accumulate wealth, devote your mind to leave ardent desires. Be content with what comes through actions already performed.

arthamanarthaṁ bhāvaya nityaṁ nāsti tataḥ sukha leśaḥ satyam |
putrādapi dhanabhājāṁ bhītiḥ sarvatraiṣā vihitā nītiḥ ‖ 2 ‖

Wealth is not welfare, truly there is no joy in it. (A man) fears even his own son, due to wealth. This is the way of wealth everywhere.

kā te kāntā kaste putraḥ saṁsāro’yamatīva vicitraḥ |
kasya tvaṁ vā kuta āyātaḥ tatvaṁ cintaya tadiha bhrātaḥ ‖ 3 ‖

Who is your lovely woman/ wife? Who is your son? This world is totally Strange. Of whom are you? From where have you come? O, Brother! ponder over these realities.

mā kuru dhanajana yauvana garvaṁ harati nimeṣāt-kālaḥ sarvam |
māyāmayamidam-akhilaṁ hitvā brahmapadaṁ tvaṁ praviśa viditvā ‖ 4 ‖

Do not be proud of wealth, people you know, and youth, which are destroyed within a wink by time. All of this is illusionary Maya, Free yourself from this and attain the timeless Brahmpad.

kāmaṁ krodhaṁ lobhaṁ mohaṁ tyaktvā”tmānaṁ paśyati so’ham |
ātmajñnāna vihīnā mūḍhāḥ te pacyante naraka nigūḍhāḥ ‖ 5 ‖

Give up your lust, anger, desire, greed, and delusion, Ponder over your real nature. Fools who don’t know themselves, Cast into hell and suffer there endlessly.

suramandira taru mūla nivāsaḥ śayyā bhūtalam-ajinaṁ vāsaḥ |
sarva parigraha bhogatyāgaḥ kasya sukhaṁ na karoti virāgaḥ ‖ 6 ‖

Stay simply in a temple or below a tree, wear the deerskin for the dress, and sleep simply on earth as your bed. Give up all attachments and renounce all comforts, Who could not be happy with such vairagya?

śatrau mitre putre bandhau mā kuru yatnaṁ vigraha sandhau |
bhava samacittaḥ sarvatra tvaṁ vāñchasyacirād-yadi viṣṇutvam ‖ 7 ‖

Don’t waste your efforts to win the love of or to fight against friend and foe, children and relatives. Look everyone and everywhere as same/ equal, If you want to attain the Vishnutva.

tvayi mayi sarvatraiko viṣṇuḥ vyarthaṁ kupyasi mayyasahiṣṇuḥ |
sarvasminnapi paśyātmānaṁ sarvatrot-sr̥ja bhedājñānam ‖ 8 ‖

In me, in you and in everything, the same Vishnu dwells, Your anger and impatience is meaningless. See yourself in everyone and give up all feelings of difference or duality completely.

prāṇāyāmaṁ pratyāhāraṁ nityānitya viveka vicāram |
jāpyasameta samādhi vidhānaṁ kurva vadhānaṁ mahad-avadhānam ‖ 9 ‖

Regulate the prANa-s, life forces, withdraw from worldly affairs,  Do think prudently of eternal and temporary things. Chant the holy name of God and silence the turbulent mind, Perform these with care, with extreme care.

nalinī dalagata jalamati taralaṁ tadvajjīvita matiśaya capalam |
viddhi vyādhyabhimāna grastaṁ lokaṁ śokahataṁ ca samastam ‖ 10 ‖

The life of a person is as uncertain as rain drops trembling on a lotus leaf. Know that the whole world remains a prey to disease, ego, and grief.

kā teṣṭādaśadeśe cintāvātula tava kiṁ nāsti niyantā |
yastvāṁ haste sudr̥ḍhanibaddhaṁ bodhayati prabhavādiviruddham ‖ 11 ‖

Why are troubled by the 18 kinds of worries? Why your mind is so wavering, unsteady flickering like the winds? Is there no-one who can control? Who can catch you by your both hands and give you such wisdom so that you can get rid of the many rebirths and stay in the Freedom from the sorrow forever?

guru caraṇāmbhuja nirbharabhaktaḥ saṁsārād-acirād-bhava muktaḥ |
sendiya mānasa niyamādevaṁ drakṣyasi nija hr̥dayasthaṁ devam ‖ 12 ‖

Oh, devotee of the lotus feet of the Guru ! May thou be soon free from Samsara. Through disciplined senses and controlled mind, thou shalt come to experience the indwelling Lord in your heart!

dvādaśapañjarikāmaya eṣaḥ śiṣyāṇāṁ kathito hyupadeśaḥ |
yeṣāṁ citte naiva vivekaste pacyante narakamanekaṁ ‖ 13 ‖

This Dwadash Panjarika is the guidance given for the disciples. In whose thoughts there is no true knowledge (of these) they remain in many hells.

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